शनिवार, 16 फ़रवरी 2008

Ye hain my india.. nameste india

मंजिलें उनको मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंख होने से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है.. इन पंक्तियों को यदि यथार्थ में देखना है कि चौबेपुर कस्बे के बगल में गजेनपुर गांव की आशा [मीना] से मिलिए।
महज दस साल की उम्र में शादी, फिर चार बच्चे, घर की डांवाडोल स्थिति, खेती के नाम पर एक टुकड़ा जमीन, घर में रोज-रोज की कलह ने उसमें इतनी कुंठा भर दी कि वह मरने के तरीके ढूंढने लगी। इसी बीच पिछले साल उसे जीने के लिए आशा की किरण नजर आई। इस किरण ने उसे ऐसी राह दिखाई कि उसकी जिंदगी के मायने ही बदल गए। मीना अब आशा में एक्रीडिएटेड सोशल हेल्थ असिस्टेंट के पद पर कार्यरत है। जिस ग्रामीण परिवेश में महिलाएं पुरुषों से बात करने में झिझकती हैं, वहां मीना उन्हें नसबंदी के लिए प्रेरित करती है। महिलाओं को बताती है कि बच्चे को अपना दूध पिलाएं। गर्भवती महिलाओं को टीकाकरण के लिए और प्रसव के लिए उन्हें स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाना उसका उद्देश्य बन चुका है। मीना के कार्य ने कब उसे जिले का सर्वश्रेष्ठ हेल्थ वर्कर बना दिया, उसे पता ही नहीं चला। प्रशासन ने उसे इस उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित भी किया।
चार बच्चों की मां मीना ने बताया कि उसके पति राजाराम प्राइवेट नौकरी करते हैं। वह पढ़ना चाहती थी कि लेकिन उसकी नानी ने अपने जीते जी पांव पूजने की लालसा में 1990 में उसकी शादी कर दी, जब वह महज दस साल की थी। ससुराल आने के बाद उसने आठवीं कक्षा पास की। समय के साथ परिवार बढ़ा तो बच्चों की पढ़ाई के लिए अपने पढ़ने की इच्छा का दमन कर दिया। दो साल पहले बेटे शशांक के जन्म के बाद नसबंदी करा ली। इलाज में 13 हजार रुपये खर्च हो जाने पर खाने तक के लाले पड़ गए। जीवन बोझ लगने लगा। झंझावत से जूझ ही रही थी कि 11 जुलाई 2006 को आशा किरण के रूप में आई, लेकिन घर में बिलखते बच्चे आशा के रूप में काम करने से राह रोक रहे थे। जैसे-तैसे काम कर रही थी कि संस्थागत प्रसव का 600 रुपये मिलने पर हौंसला बढ़ा। फिर ठान लिया कि कुछ कर दिखाना है। पिछले साल अप्रैल में लांघ गई घर की चौखट और आज यही दिनचर्या हो गई है।
घर की आर्थिक स्थिति के बारे में मीना कहती है कि बटाई पर खेत लेकर अनाज पैदा करना चाहा, लेकिन धनाभाव में खेती न हो सकी। बिजली का बकाया 13 हजार रुपये का बिल बोझ की तरह था। इस बीच, आशा के रूप में की गई मेहनत रंग लाई। संस्थागत प्रसव यानि स्वास्थ्य केंद्र पर प्रसव कराने की सरकार की योजना के तहत उसे 24,000 रुपये का चेक मिला तो जीवन की गाड़ी पटरी पर आ गई। वह गर्व से बताती है कि बटाई वाले खेत में इस बार आलू बोया है। थोड़े ही सही, लेकिन अपने खेत में गेहूं की फसल है। एक भैंस खरीदी, फिर बेचकर सात हजार रुपये में गाय ले ली। शेष धन में 13 हजार रुपये का बिजली का बिल चुका दिया। अब घर पक्का करने की लालसा है। गांव में स्थिति यह है कि लोग उसकी चर्चा करने में गर्व महसूस करते हैं। खुद चौबेपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्साधिकारी डा. मेजर रणवीर सिंह गर्व से कहते हैं कि वह उनके स्वास्थ्य केंद्र की आशा है।
बड़ा कर लिया गांव
-कार्य करने के लिए अपना गांव छोटा पड़ने लगा तो मीना ने गोगूमऊ, मालौं, बजराहपुरवा व चौबेपुर में भी संपर्क करना शुरू कर दिया। पिछले साल अप्रैल से 31 जनवरी तक वह 41 प्रसव करा चुकी है। इस माह में भी प्रसव की संख्या तीन पहुंच चुकी है। उनके संपर्क में जो महिलाएं हैं, उनमें से सात या आठ का प्रसव तो इसी माह होना है। 31 मार्च तक प्रसव की संख्या 60 पहुंच जाएगी। इधर, नसबंदी करवाने, पल्स पोलियो अभियान, नियमित टीकाकरण में प्रोत्साहन भत्ता देख इनमें भी सक्रिय भागीदारी निभानी शुरू कर दी। rajiv ji kya baat hian aap hain nameste india ke salam ke asli haqdar.. nameste india..

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